############ ॐ ###############
जिनके मन मे सदैव परोपकार की भावना रहती हैं, उनकी मुसीबते जल्द ख़त्म हो जाती है और उन्हे पग-पग पर यश की प्राप्ति होती हैं |
############ ॐ ###############
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शनिवार, 18 अप्रैल 2015
शुक्रवार, 13 सितंबर 2013
चाणक्य सूत्र # 4
############ ॐ ###############
अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।
भावार्थ - जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।
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अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।
भावार्थ - जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचाने या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।
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गुरुवार, 20 मई 2010
चाणक्य सूत्र # 3
############ ॐ ###############
सतां मार्गेण मतिमान् को कम्र्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्लमश्नुते।।
भावार्थ - बुद्धिमान सत्पुरुषों के मार्ग का अनुसरण करते हुए निश्चित समय पर कार्य आरंभ करें। जो मनुष्य समय पर कार्य करता है उसे रसयुक्त फल की प्राप्ति अवश्य होती है।
############ ॐ ###############
सतां मार्गेण मतिमान् को कम्र्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्लमश्नुते।।
भावार्थ - बुद्धिमान सत्पुरुषों के मार्ग का अनुसरण करते हुए निश्चित समय पर कार्य आरंभ करें। जो मनुष्य समय पर कार्य करता है उसे रसयुक्त फल की प्राप्ति अवश्य होती है।
############ ॐ ###############
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
चाणक्य सूत्र # 2
ये प्रियाणि प्रभाषन्ते प्रयच्छन्ति च सत्कृतिम्।
श्रीमन्तोऽनिद्य चरिता देवास्ते नरविग्रहाः।।
भावार्थ-जो मनुष्य सदैव प्रिय और मधुर वाणी बोलने के साथ ही सत्पुरुषों की निंदा से रहित होते हैं उनको शरीरधारी देवता ही समझना चाहिये।
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स्वभावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन व बान्धवान्।
स्त्रीभृत्यान् प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम्।।
भावार्थ-स्वभाव से मित्र, सद्भाव स बंधुजन, प्रेमदान से स्त्री और भृत्यों को चतुराई से वश में करें।
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मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।
त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।
भावार्थ-अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें। ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।
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सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।
अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।
भावार्थ-वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।
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सूक्ष्मा सत्तवप्रयत्नाभ्यां दृढ़ा बुद्धिरधिष्ठिता।
प्रसूते हि फलं श्रीमदरणीय हुताशनम्।।
भावार्थ-जो बुद्धि सूक्ष्म तत्त्वगुण का ज्ञान होने से दृढ़ स्थिति में है वह धन रूपी फल को उत्पन्न करती है जिस प्रकार अरणी काष्ट अग्नि को प्रकट करता है।
################################
धातोश्चामीकरमिव सर्पिनिर्मथनादिव।
बुद्धिप्रयत्नोपगताध्यवसायाद्ध्रवं फलम्।।
भावार्थ-जिस तरह अनेक धातुओं में मिला होने पर भी गलाने से प्रकट होता है तथा दही मथने से घृत प्रगट होता है वैसे बुद्धि और उद्योग से के संयुक्त उद्यम से फल की प्राप्ति भी होती है।
श्रीमन्तोऽनिद्य चरिता देवास्ते नरविग्रहाः।।
भावार्थ-जो मनुष्य सदैव प्रिय और मधुर वाणी बोलने के साथ ही सत्पुरुषों की निंदा से रहित होते हैं उनको शरीरधारी देवता ही समझना चाहिये।
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स्वभावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन व बान्धवान्।
स्त्रीभृत्यान् प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम्।।
भावार्थ-स्वभाव से मित्र, सद्भाव स बंधुजन, प्रेमदान से स्त्री और भृत्यों को चतुराई से वश में करें।
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मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।
त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।
भावार्थ-अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें। ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।
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सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।
अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।
भावार्थ-वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।
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सूक्ष्मा सत्तवप्रयत्नाभ्यां दृढ़ा बुद्धिरधिष्ठिता।
प्रसूते हि फलं श्रीमदरणीय हुताशनम्।।
भावार्थ-जो बुद्धि सूक्ष्म तत्त्वगुण का ज्ञान होने से दृढ़ स्थिति में है वह धन रूपी फल को उत्पन्न करती है जिस प्रकार अरणी काष्ट अग्नि को प्रकट करता है।
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धातोश्चामीकरमिव सर्पिनिर्मथनादिव।
बुद्धिप्रयत्नोपगताध्यवसायाद्ध्रवं फलम्।।
भावार्थ-जिस तरह अनेक धातुओं में मिला होने पर भी गलाने से प्रकट होता है तथा दही मथने से घृत प्रगट होता है वैसे बुद्धि और उद्योग से के संयुक्त उद्यम से फल की प्राप्ति भी होती है।
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
चाणक्य सूत्र # 1
"Once you start a working on something, don't be afraid of failure and don't abandon it. People who work sincerely are the happiest."
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"Before you start some work, always ask yourself three questions - Why am I doing it, What the results might be and Will I be successful.Only when you think deeply and find satisfactory answers to these questions, go ahead."
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"Before you start some work, always ask yourself three questions - Why am I doing it, What the results might be and Will I be successful.Only when you think deeply and find satisfactory answers to these questions, go ahead."
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