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बुधवार, 1 अप्रैल 2020

शेख बाबा फरीद जी

############ ॐ ###############

फरीदा मै जानिया दुखु मुझ कू, दुखु सवाइये जगि|
ऊंचे चडि कै देखिया , तां घरि घरि एहा अगि||

भावार्थ -  है फरीद ! मै पहले मन की खाईयो से पैदा हुये दुख से घबराकर यह समझा कि दुख सिर्फ मुझे ही है | सिर्फ मै ही दुखी हूं, पर असल मे यह दुख तो सारे ही जगत मे व्याप्त हो रहा है | जब मैने अपने दुख से उंचा उठकर ध्यान दिया तो मैने देखा कि प्रत्येक घर मे यही आग जल रही है अर्थात प्रत्येक जीव दुखी है|
 
############ ॐ ###############

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

शेख बाबा फरीद जी # 6

############ ॐ ############### 

फरीदा जे तु अकलि लतीफु ,काले लिखु न लेख||
आपनडे गिरीवान महि , सिरु नीवां करि देखु||

भावार्थ - है. फरीद ! यदि तु सुक्ष्म अक्लवाला-समझदार है तो अन्य लोगो के मंद कर्मो की जांच पडताल ना कर , अपने गिरेवान मे मुंह डालकर देख कि तेरे अपने कर्म कैसे है|


############ ॐ ###############

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

शेख बाबा फरीद जी # 5

############ ॐ ###############

सबरु एहु सुआउ , जे तुं बंदा दिडु करहि |
वधि थीवहि दरीआउ, टुटि न थीवहि वाहडा ||

भावार्थ - है मनुष्य ! यह संतोष ही जिंदगी का वास्तविक निशाना है , यदि तुम सब्र को ह्रदय मे द्रढ कर ले तो तुम बढकर दरिया हो जाओगे , पर कम होकर छोटा सा तुच्छ नाला नही बनोगे अर्थात संतोष वाला जीवन बनाने से तुम्हारा दिल विशाल होकर दरिया हो जायेगा , तेरे दिल मे सारे जगत के लिये प्यार पैदा हो जायेगा . तेरे अंदर संकीर्णता नही रह जायेगी|

############ ॐ ###############

सोमवार, 11 जनवरी 2016

शेख बाबा फरीद जी # 4

############ ॐ ###############
 
सभना मन माणिक ,ठाहणु मुलि मचांगवा |
जे ताउ पिरीआ दीसिक, हिआउ न ठाहे कहीदा ||

भावार्थ - सभी जीवो के मन मोती है, किसी को भी दुखाना बिलकुल अच्छा नही | यदि
तुझे प्यारे प्रभु को मिलने की इच्छा है तो किसी का दिल न दुखा ||

############ ॐ ###############

सोमवार, 20 जुलाई 2015

भक्त रविदास जी # 1

############ ॐ ###############

जब हम होते तब तू नाही, अब तू ही मैं नाही ।
अनल अगम जैसे लहरि मइ ओदधि, जल केवल जल माही ||  

भावार्थ - है माधौ ! जब तक हम जीवो के अंदर अहंकार रहता है तब तक तू प्रकट नहीं होता , पर जब तू प्रत्यक्ष होता है तब हमारा मैं दूर हो जाता है । जैसे बड़ा तूफ़ान आने पर समुद्र लहरो से नकानक भर जाता है पर असल में वे लहरे समुद्र के पानी में पानी ही है , वैसे ही सभी जीव जंतु तेरा अपना ही विकास है |

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

शेख बाबा फरीद जी # 3

############ ॐ ###############

जे जाणा मरि जाइए ,घुमि न आइये |
झुठी दुनीआ लगि, न आपु वजाइये ||
बोलिए सचु धरमु ,झुठु न बोलिए |
जो गुरु दसै वाट, मुरीदा जोलिऐ ||


भावार्थ -जब तुझे पता है कि आखिर मरना ही है तथा फिर यहां नही आना , तो इस
नाशवान दुनियां के साथ प्रीति लगाकर अपना आप गवाना नही चाहिये |
सत्य तथा धर्म ही बोलना चाहिये , झुठ नही बोलना चाहिये , जो रास्ता
गुरु बताये ,उस रास्ते पर मुरीद बनकर चलना चाहिये |

############ ॐ ###############

सोमवार, 6 सितंबर 2010

शेख बाबा फरीद जी # 2

############ ॐ ###############

फरीदा चिंत खटोला, वाणु दुखु , बिरहि विछावण लेफु|
एहु हमारा जीवणा, तु साहिब सचे वेखु||


भावार्थ - है फरीद ! प्रभु की याद भुलाकर चिंता हमारी छोटी सी चारपाई बनी हुई है, दुख उस चारपाई का बाण है तथा वियोग के कारण दुख ही विछोना तथा तुलाई है| है सच्चे स्वमी ! दुख ,तुझसे बिछुडकर ,यह है हमारा जीवन |

############ ॐ ###############

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

शेख बाबा फरीद जी # १

############ ॐ ###############

रुखी सुखी खाइ के , ठंडा पाणी पीउ |
फरीदा देखि पराई चोपडी ,ना तरसाए जीउ||


भावार्थ - है फरीद ! अपनी कमाई की रुखी सुखी खाकर ठंडा पनी पी ले; पराई स्वादिष्ट रोटी देखकर अपना मन ना तरसा|बंदगी करने वाले इंसान को परमात्मा का नाम सभी पदार्थो से अधिक प्यारा लगता है|उसका जीवन संतोष वाला होता है| अपनी हक की कमाई के सामने वह बेगाने बढिया पदर्थो की भी परवाह नही करता |

############ ॐ ###############

सोमवार, 28 जून 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब # 3

############ ॐ ###############

पर का बुरा न राखहु चीत।
तम कउ दुखु नहीं भाई मीत।


भावार्थ - दूसरे के अहित का विचार मन में भी नहीं रखना चाहिये। दूसरे के हित का भाव रखने वाले मनुष्य के पास कभी दुःख नहीं फटकता।

############ ॐ ###############

बुधवार, 19 मई 2010

श्रीगुरुवाणी # 2

############ ॐ ###############

हउमै दीरघ रोग है दारु भी इस माहि।
किरपा करे जो आपणी ता गुर का सब्दु कमाहि।।

भावार्थ-अहंकार एक भयानक रोग है जिसकी जड़ें बहुत गहरे तक फैल जाती हैं। इसका इलाज गुरु की कृपा से प्राप्त शब्द ज्ञान से ही संभव हो सकता है।

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 8 जनवरी 2010

श्रीगुरुवाणी # 1

‘जाति जनमु नह पूछीअै, सच घर लेहु बताई।
सा जाति सा पति है, जेहे करम होई।।’


भावार्थ-किसी की जाति या जन्म के बारे में न पूछें। सभी एक ही सर्वशक्तिमान के घर से जुड़े हुए हैं। आदमी की जाति और समाज (पति) वही है जैसे उसका कर्म है।

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‘नीचा अंदरि नीच जाति, नीची हू अति नीचु।
नानक तिल कै संगि साथि, वडिआ सिउ किआ रीस।
जिथै नीच समालिअन, तिथे नदर तेरी बख्सीस।


भावार्थ-जे नीच से भी नीच जाति का है हम उसके साथ हैं। बड़ी जाति वालों से होड़ करना व्यर्थ है बल्कि जहां गरीब, पीड़ित और निचले वर्ग के व्यक्ति की सहायता की जाती है वहीं सर्वशक्तिमान की कृपा बरसती है।