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मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

पद्मपुराण # 2

############ ॐ ###############

कामवासना का त्याग व्रत के समान ;
अहिंसा सिद्धि के समान ;
उपवास ही उत्तम तपस्या के समान ;
संतोष ही शुद्ध धन/बड़े भोग  के समान ;
परायी स्त्री माता और पराया धन मिटटी के समान होता है ।

############ ॐ ###############

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

पद्मपुराण # 1

############ ॐ ###############

पुत्र की उत्पत्ति और पालन के लिए माता पिता को जो क्लेश सहने पड़ते है उनका बदला १०० वर्षो में भी नहीं चुकाया जा सकता है । पुत्र को चाहिए की वो माता पिता व गुरु का प्रिय करे । इस तीनो  संतुष्ट होने पर सब तपस्या पूर्ण हो जाती है , इनकी सेवा ही सबसे बड़ा तप , इनकी आज्ञा का उल्लंघन करके किया कार्य सिद्ध नहीं होता । जिससे इन तीनो को संतोष हो वही पुरुषार्थ है |

############ ॐ ###############

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

आदिगुरु शंकराचार्य

############ ॐ ###############


यदिदं सकलं विश्वं नानारूपम् प्रतितमज्ञानात्  ।
तत्सर्वं ब्रह्मवेम प्रत्यस्ताशेषभावनादोषम ॥
निरस्तमायाकृत सर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलं प्रमेयम्    ।
अरूपमव्यक्तं  नाखयमव्ययम  ज्योतिः स्वयं किच्चिदिदम् चकास्ति || 

भावार्थ - यह संपूर्ण विश्व जो अज्ञान से नानारूप व् नाम वाला प्रतीत होता है , दरअसल वह समस्त भावनाओ के दोषो से रहित ब्रह्म ही है।
वह समस्त काल्पनिक भेदो से रहित है, नित्य सुखस्वरूप , कलारहित और प्रमाणादि का अविषय है । वह कोई अरूप , अव्यक्त , अनाम , अक्षय तेज है , जो स्वयं ही प्रकाशित हो रहा है ।

############ ॐ ###############

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

महर्षि पतंजलि

 ############ ॐ ###############

योग विज्ञान उन्ही के लिए है ,जो योग विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयोग का अनुशासन स्वीकारते है। ये मूल वैज्ञानिक प्रयोग ८ है -
1. यम - व्यवहार के परिष्कार के लिए , जिसमे सदाचार के सूत्र है।
2. नियम - चिंतन के बिखराव-भटकाव के नियमन के लिए|
3. आसन - शरीर को द्रण - निरोग करने के लिए|
4. प्राणायाम - प्राण के परिमार्जन के लिए|
5. प्रत्याहार - चिंतन चेतना के साथ प्राण-प्रवाह को अंतर्लिन करने के लिए|
6. धारणा - तत्व को, सत्व को और सत्य को धारण करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए|
7. ध्यान - धारणाओं में निमग्न होने के लिए|
8. समाधी - ध्यान के द्वार से प्रवेश कर सत्य में , स्वयं के स्वरुप में प्रतिष्ठित होने के लिए|

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

भर्तृहरि शतक # 3

  ############ ॐ ###############

किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।
मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण कंकोलनिम्बकुटजा अपि चंन्दनाः स्युः।।

भावार्थ - चांदी के रंग के उस हिमालय की संगत से भी क्या लाभ होता है, जहां के वृक्ष केवल वृक्ष ही रह गये। हम तो उस मलयाचल पर्वत को ही धन्य मानते हैं जहां निवास करने वाले कंकोल, नीम और कुटज आदि के वृक्ष भी चंदनमय हो गये।

 ############ ॐ ###############

सोमवार, 6 जुलाई 2015

आचार्य विनोभा भावे

 ############ ॐ ###############

श्रीमद्‍भगवद्‍गीता जीवन प्रबंधन का ग्रन्थ है | जो अपने जीवन का प्रबंधन  कर सकता है वह जगत का प्रबंधन कर सकता है । गीता अध्यात्म का वैज्ञानिक ग्रन्थ है । इसमे परंपराओं की लकीरे मिटाकर प्रयोगो के प्रतिमान स्थापित किये गये है । वैदिक ज्ञान की परंपरा में पहली बार गीता ने सत्य के अन्वेषण के लिए वेदो के भी पार और परे जाने की बात की । गीता में जीवन एवं जगत की संरचना - क्रिया , इनकी अंत क्रियाओ व् इनके परिणामो का बड़ा सूक्ष्म वैज्ञानिक विवेचन है |

############ ॐ ###############

सोमवार, 22 जून 2015

भर्तृहरि शतक #2

 ############ ॐ ###############

क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः क्षणं वितैहीनः क्षणमपि च संपूर्णविभवः।
जराजीर्णेंगर्नट इव वलीमण्डितततनुर्नरः संसारान्ते विशति यमधानीयवनिकाम्।।

भावार्थ - क्षण भर के लिये बालक, क्षणभर के लिये रसिया, क्षण भर में धनहीन और क्षणभर में संपूर्ण वैभवशाली होकर मनुष्य बुढ़ापे में जीर्णशीर्ण हालत में पहुंचने के बाद यमराज की राजधानी की तरफ प्रस्थित हो जाता है। एक तरह से इस संसार रूपी रंगमंच पर अभिनय करने के लिये मनुष्य आता है।

############ ॐ ###############

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

भर्तृहरि शतक #1

############ ॐ ###############

ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक्संयमो ज्ञानस्योपशमः श्रुतस्य वित्तस्य पात्रे व्ययः।
अक्रोधस्तपसः क्षमा प्रभवितुर्धर्मस् निव्र्याजता सर्वेषमपि सर्वकारणमिद्र शीलं परं भूषणम्||

भावार्थ - सज्जनता ऐश्वर्य का, संयम शौर्य का, ज्ञान शांति का, शास्त्र का विनय भाव आभूषण है। उसी धन का सदुपयोग करने से है। तपस्या का महत्व अक्रोध से तो, प्रभुत्व की शोभा क्षमादान से है। धर्म की शोभा निष्कपटता से प्रदर्शित होती है। इनमें भी सदाचार सभी आभूषणो का आभूषण है।

############ ॐ ###############

रविवार, 22 मई 2011

भगवान महावीर

जीवन भ्रान्ति नही है, संसार माया नही है , यह तो आत्मा एवं सर्वात्मा
की अभिव्यक्ति का सर्वोत्तम माध्यम है | यह अभिव्यक्ति उत्तरोत्तर जितनी
सम्पुर्ण व समग्र होती जाती है, उतना ही इसका सोन्दर्य बढता जाता है
| आत्मा एवं सर्वात्मा की अभिव्यक्ति की सम्पुर्णता मे ही जीवन एवं संसार
के सोन्दर्य की सम्पुर्णता है | इसी मे क्षण- क्षण प्रसनता व आनंद की
अनुभुति होती है | इस अनुठी अभिव्यक्ति का माध्यम है सच्चिन्तन एवं
सत्कर्म | इस और हम जितना भी बढते है , प्रसन्नता और आनन्द भी उतना ही
बढता है | इसमे पांच बाधाये है-

  1. विवेक का अभाव , यानि कि मिथ्यात्व ,

  2. वैराग्य का अभाव ,जिसकी वजह से राग द्वेष पनपते है ,

  3. प्रमाद यानि सच्चिंतन एवं सत्कर्मो को न करने की प्रवर्ति

  4. कषाय, जो लोभ , क्रोध , मान, माया का रुप लेकर आते है

  5. मानसिक , वाचिक , कायिक क्रियाओ मे विक्रतियो व विकारो का योग



इन सभी बाधाओ को दूर करने के उपाय है -

  1. सम्यक दर्शन - अर्थात आध्यात्मिक सिद्धांतो एवं प्रयोगो को सम्पुर्ण
    अन्तर्मन से स्वीकारना

  2. सम्यक ग्यान - इसके तत्व को गहनता से आत्मसात कर लेना

  3. सम्यक चरित्र - इसके अन्तर्गत अपने को आध्यात्मिक सिद्धांतो एवं प्रयोगो मे
    इस कदर ढालना होता है कि समुचा जीवन ही अध्यात्म विग्यान की
    परिभाषा बन जाये , ऐसा होने पर केवल ग्यान होता है, जिसमे सत्ता एवं
    सत्य की सम्पूर्ण अनुभुति होती है , जबकि सामान्य अवस्थाओ मे इसके
    सापेक्षिक अनुभव ही हो पाते है.

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

महाभारत

############ ॐ ###############

अहन्यहनि भुतानि गच्छन्ति यममन्दिरम|
शेषा: स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम ||


भावार्थ - प्रतिदिन मनुष्य म्रत्यु के मुख का ग्रास बन रहा है, परन्तु फिर भी उसे होश नही है| वह सोचता है, जिसे मरना है वही मरेगा , मै तो ठीक बना रहुंगा | बद्ध जीव को बन्धन के प्रति कोई होश नही रहता | वह कसकर बन्धा हुआ है, इसका ख्याल नही| इसिलिये मनुष्य योजनाये बनाता है, कल्पनाये करता है- ' यह करुन्गा , वह करुन्गा' , लेकिन यह नही सोचता कि आज ही बुलावा आ जये तो सब छोड्कर चले जाना होगा |

############ ॐ ###############