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बुधवार, 24 जनवरी 2018

रामचरित मानस # 17

############ ॐ ###############

काल दंड गहि काहू न मारा | हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ||

भावार्थ -काल दंड (लाठी) लेकर किसी को नहीं मारता | वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है ||

############ ॐ ###############

रविवार, 29 जनवरी 2017

रामचरित मानस # 16

############ ॐ ###############
 
जनही मोर बल निज बल ताहि | दुहु कह काम क्रोध रिपु आही |
यह बिचारी पंडित मोहि भजहि | पाएहु ज्ञान भगति नहि तजही ||

भावार्थ - मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और ज्ञानी को अपना बल होता है | पर काम-क्रोध रूपी शत्रु तो दोनों के लिए है | [ भक्त के शत्रुओ को मरने की जिम्मेवारी मुझ पर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है, परन्तु अपने बल को मानने वाले ज्ञानी के शत्रुओ का नाश करने की जिम्मेवारी मुझ पर नहीं है | ऐसा विचारकर बुध्हिमान लोग मुझको ही भजते है | वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति को नहीं छोड़ते |

############ ॐ ###############

शनिवार, 28 नवंबर 2015

रामचरित मानस # 15

############ ॐ ###############

तात तिनी अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ |
मुनि बिज्ञान धाम मन करही निमिष महू क्षोभ ||

लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारी |
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहही बिचारी || 


भावार्थ - हे तात ! काम, क्रोध और क्षोभ - ये तीन अत्यंत प्रबल दुष्ट है | ये विज्ञान के धाम मुनियों के भी मनों को पल भर में क्षुब्ध कर देते है | लोभ को इच्छा और दंभ का बल है, काम को केवल स्त्री का बल है और क्रोध को कठोर वचनों का बल है | श्रेष्ठ मुनि ऐसा विचार कर के कहते है |

############ ॐ ###############

सोमवार, 13 जुलाई 2015

रामचरित मानस # 14

  ############ ॐ ###############

जाति पांति कुल धर्म बड़ाई | धन बल परिजन गुण चतुराई ||
भगति हीन नर सोहई कैसा | बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ||


भावार्थ -  जाति, पाति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुंब, गुण और चतुरता- इन सब के होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल दिखाई पड़ता है |


 ############ ॐ ###############

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

रामचरित मानस # 13

 ############ ॐ ###############

तब लगि ह्रदय बसत खल नाना | लोभ मोह मच्छर मद माना ||
जब लगि उर न बसत रघुनाथा | धरे चाप सायक कटी भाथा ||

भावार्थ -  लोभ, मोह, मत्सर (दह), मद और मान आदि अनेको दुष्ट तभी तक ह्रदय में बसते है, जब तक की धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी ह्रदय में नहीं बसते (उनके आदर्श मूल्यों का अपने जीवन में अनुसरण नही होता) |




############ ॐ ###############

सोमवार, 26 अगस्त 2013

रामचरित मानस # 12

############ ॐ ###############
अमल अचल मन त्रोन समाना | सम जम नियम सिलीमुख नाना ||
कवच अभेद बिप्र गुरु पूजा | एही सम बिजय उपाय न दूजा ||५||


भावार्थ -

निर्मल (पाप रहित ) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है | शम (मनका वश में होना) [अहिन्सादी] यम और [शोचादि ] नियम- ये बहुत से बाण है | ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेध्य कवच है | इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है |
 ############ ॐ ###############

रविवार, 29 मई 2011

रामचरित मानस # ११ (नवधा भक्ति)

############ ॐ ###############
प्रथम भगति संतन्ह कर संग | दूसरी रति मम कथा प्रसंगा ||
गुर पद पंकज सेवा तीसरी भगति अमान |
चौथी भगति मम गुण गन करइ कपट तजि गान ||
मंत्र जाप मम दृड़ बिस्वासा | पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||
छठ दम सील बिरति बहु करमा | निरत निरंतर सज्जन धरमा ||
सातव सम मोहि माय जग देखा | मोते संत अधिक करी लेखा ||
आठव जथालाभ संतोषा | सपनेहु नहीं देखइ परदोषा ||
नवम सरल सब सन छलहीना | मम भरोस हिय हरष न दीना ||

भावार्थ -

पहली भक्ति है संतो का सत्संग |
दूसरी भक्ति है मेरे कथा -प्रसंग में प्रेम |
तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण-कमलो की सेवा
चौथी भक्ति यह है की कपट छोड़कर मेरे गुणसमुहो का गान करे |
मेरे मंत्र का जाप और मुझ में दृढ विश्वास - यह पांचवी भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है |
छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र) बहुत कार्यो से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषो के धर्म में लगे रहना |
सातवी भक्ति है जगत्भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत देखना और संतो को मुझसे भी अधिक करके मानना |
आठवी भक्ति है जो कुछ मिल जाय, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को न देखना |
नवी भक्ति है सरलता और सब के साथ कपट रहित बर्ताव करना, ह्रदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना |

############ ॐ ###############

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

रामचरित मानस # 10

############ ॐ ###############

मोरे प्रोढ तनय सम ज्ञानी | बालक सूत सम दास अमानी ||
जानही मोर बल निज बल ताहि | दुहु कह काम क्रोध रिपु आही ||


भावार्थ - सयाना हो जाने पर पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं कहती | (अर्थात माँतृपरायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिंता नहीं करती, क्योंकि वे माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है ) ज्ञानी मेरे प्रोढ (सयाने) पुत्र के समान है और अपने बल का मान न करने वाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है |

############ ॐ ###############

सोमवार, 12 जुलाई 2010

रामचरित मानस # ९

############ ॐ ###############

राम बिमुख सम्पति प्रभुताई | जाई रही पाई बिनु पाई ||
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाही | बरषि गए पुनि तबही सुखाही ||


भावार्थ - रामविमुख पुरुष की सम्पति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पाने के समान है | जिन नदियों के मूल में कोइ जलस्त्रोत नहीं है (अर्थात जिन्हें केवल बरसात का ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सुख जाती है |

############ ॐ ###############

मंगलवार, 8 जून 2010

रामचरित मानस # 8

############ ॐ ###############

सचिव बैद गुर तीनी जौँ प्रिय बोलहिं भय आस |
राज धर्म तन तीनी कर होई बेगिहीं नास ||


भावार्थ - मंत्री, विद्या और गुरु- ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय या लाभ कि आशा से हित कि बात न कहकर प्रिय बोलते है तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म - इन तीनो का शीघ्र ही नाश हो जाता है |

############ ॐ ###############

मंगलवार, 11 मई 2010

रामचरित मानस # 7

############ ॐ ###############

सरनागत कहू जे तजही निज अनहित अनुमानी |
ते नर पावर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ||


भावार्थ - जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आये हुए का त्याग कर देते है, वे पामर (क्षुद्र) है, पापमय है, उन्हें देखने में भी हानि है (पाप लगता है) |

############ ॐ ###############

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

रामचरित मानस # 6

############ ॐ ###############

जो नर होई चराचर द्रोही | आवे सभय सरन ताकि मोहि ||
तजि मद मोह कपट छल नाना | करउ सध्य तेहि साधू समाना ||
जननी जनक बंधू सुत दारा | तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ||
सब के ममता ताग बटोरी | मम पद मनही बाँध बरी डोरी ||
समदरसी इच्छा कछु नाही | हरस सोक भय नहीं मन माहि ||
अस सज्जन मम उर बस कैसे | लोभी ह्रदय बसई धनु जैसे ||


भावार्थ - कोई मनुष्य [संपूर्ण] जड़-चेतन जगत का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल-कपट त्याग दे तो मैं सुए बहुत शीघ्र साधू के सामान कर देता हूँ | माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र, और परिवार - इन सब के मम्त्वरुपी तागो को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणों में बांध देता है (सारे सांसारिक संबंधो का केंद्र मुझे बना लेता है ), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और झिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है | ऐसे सज्जन मेरे ह्रदय में कैसे बसता है, जैसे लोभी के ह्रदय में धन बसा करता है |

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

रामचरित मानस # 5

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आगम निगम प्रसिद्ध पुराना | सेवाधरमु कठिन जगु जाना ||
स्वामी धरम स्वारथही बिरोधु | बैरु अंध प्रेमही न प्रबोधु ||४||


भावार्थ- वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत जानता है की सेवा धर्म बड़ा कठिन है | स्वामी धर्म (स्वामी के प्रति कर्त्तव्य पालन में) और स्वार्थ में विरोध है (दोनों एक साथ नहीं निभ सकते) वैर अँधा होता है और प्रेम को ज्ञान नहीं रहता [ मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनों में ही भूल होने का भय है ]

Meaning - It is fully recognized in the Tantras, Vedas and Puranas and all the world knows that the duty of a servant is hard indeed. Duty to a master is incompatible with selfishness. hatred is blind and love is not discreet. HR people recognize this problem as agency problem or principle agent conflict.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

रामचरित मानस # 4

राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा | हरिही समर्पे बिनु सत्कर्मा ||४||
बिद्या बिनु बिबेक उपजाए | श्रम फल पढ़े किए अरु पाए ||
संग ते जती कुमंत्र ते राजा | मान ते ज्ञान पान ते लाजा ||५||
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी | नासहि बेगी नीति अस सुनी ||6||


भावार्थ- नीति के बिना राज्य और धर्म के बिना धन प्राप्त करने से, भगवान को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करने से और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़ने से परिणाम में श्रम ही हाथ लगता है| बिषयों के संग से सन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, नम्रता के बिना प्रीति और मद (अंहकार) से गुणवान शीघ्र ही नस्ट हो जाते है|

Meaning - Sovereignty without political insight, wealth divorced from virtue, noble deeds that have not been offered to Shri Hari (God) and learnig which does not beget wisdom is nothing but fruitless labour to the man who has gained such kingdom or wealth, to the doer of the noble acts and to the student repsetvively. A recluse is quickly undone by attachment, a king by evil counsel, wisdom by conceit, modesty by drinking, friendsip by want of love and man of merit by vanity.

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

रामचरित मानस # 3

तब मारीच ह्रदय अनुमाना | नवाही बिरोधे नहीं कल्याना ||
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनि | बैद बंदी कबी भानस गुनी ||२||


भावार्थ- तब मारीच ने ह्रदय में अनुमान किया की शस्त्री (शस्त्र धारी) , मर्मी (भेद जानने वाला), समर्थ स्वामी, मुर्ख, धनवान, वैद्य, भाट , कवि, और रसोइया - इन नो व्यक्तियों से विरोध करने से कल्याण (कुशल) नहीं होता |

Meaning - Then Marich thought to himself, "It is not good to make enemies of the following nine, viz one skilled in the use of weapon, he who knows one's secret, a powerful master, a dunce, a wealthy man, a physician, a panegyrist, a poet, an person who cooks for you.

सोमवार, 4 जनवरी 2010

रामचरित मानस # 2

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति | सहज कृपन सन सुंदर नीति ||१||
ममता रत सन ज्ञान कहानी | अति लोभी सन बिरती बखानी ||
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा | उसर बिज बए फल जथा ||२||


भावार्थ - मुर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति (उदारता का उपदेश), ममता में फसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा उसर में बीज बोने से होता है (अर्थात उसर में बीज बोने की भाति यह सब व्यर्थ जाता है)

Meaning - Supplication before an idiot, friendship with a rogue, inculcating liberality on a born miser, talking wisdom to one steeped in worldliness, glorifying dispassion before a man of excessive greed, a lecture on mindcontrol to an irascible man and a discourse on the exploits of Sri Hari to a libidinous person are as futile as sowing seeds in a barren land.

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काटेही पई कदरी फरइ कोटि जतन कोऊ सींच |
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेही पई नव नीच ||


भावार्थ - चाहे कोई करोडो उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है | नीच विनय से नहीं मानता, वह डाटने पर ही झुकता है (रास्ते पर आता है)

Meaning - Though one may take infinite pains in watering a plantain it will not bear fruit unless it is hewed, Similarly, mark me, O king of birds (continues Kakabhusundi) , a vile fellow heeds no prayer but yields only when reprimanded.

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

रामचरित मानस # 1

भानु पीठी सेइअ उर आगि | स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी ||२||

भावार्थ- सूर्य को पीठ से और अग्नि को ह्रदय से (सामने से) सेवन करना चाहिए | परन्तु स्वामी की सेवा तो छल छोड़कर सर्वभाव से (मन, वचन, कर्म से) करनी चाहिए |

Meaning - (For warming oneself) one should wait upon the sun turning one's back towards the same, while fire should be waited upon turning one's breast towards it. But a master must be served with one's whole being (in though, word and deed) without resoring to any wiles.

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तजि माया सेइअ परलोका | मिताही सकल भवसंभव सोका ||
देह धरे कर यह फलु भाई | भजिय राम सब काम बिहाई ||३||


भावार्थ-माया (विषयो की ममता - आसक्ति ) को छोड़कर परलोक का सेवन (भगवान के दिव्या धाम की प्राप्ति के लिए भगत्सेवारूप का साधन) करना चाहिए, जिससे भाव (जन्म मरण) से उत्पन्न सारे शोक मिट जाये | हे भाई! देह धारण करने का यही फल है कि सब कर्मो (कामनाओ) को छोड़कर श्रीरामजी का भजन ही किया जाए |

Meaning - Similarly one should strive for (lasting happiness in) the other world by discarding the unrealities of the world. In this way all one's woes incident to birth and death are eradicated. The consummation of human birth, brethren, lies in worshipping Shri Ram in a disinterested spirit.

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सोई गुनग्य सोई बडभागी | जो रघुबीर चरण अनुरागी ||

भावार्थ-सदगुणों को पहचानने वाला (गुणवान) तथा बडभागी वही है जो श्रीरधुनाथजी के चरणों का प्रेमी है

Meaning - He is verily a man of flair and he alone is highly blessed, who is enamoured of Shri Ram Feet.