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सोमवार, 30 सितंबर 2019

श्री रामकृष्ण परमहंस # 12

############ ॐ ###############

यह शरीर भगवान का मन्दिर है तथा इस मन्दिर मे भगवान की प्रतिष्ठा करना ही हमारा उद्देश्य है | इसिलिये उसे स्वस्थ , सुन्दर, और सबल रखना होगा | और जो यह नही करता वह अपनी दुर्बलता का परिचय देता है| उसकी यही दुर्बलता उसे अधिकाधिक कष्टप्रद अवस्था मे ले जाती है|

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

श्री रामकृष्ण परमहंस # 11

############ ॐ ############### 

जलराशी मे यदि एक लाठी रखी जाये , तो ऐसा प्रतीत होता है मानो जल के दो भाग हो गये , पर वास्तव मे जल जैसा था वैसा ही रहता है , केवल लाठी के रहने से दो भाग हुये से दिखायी देते है | उसी प्रकार 'मै' - बुद्धि के रहने से ही ऐसा प्रतीत होता है कि मेरा व्यक्तित्व अलग हो गया है | अब उस अहं की लाठी को उठा लो तो वही एक जल रह जायेगा | 'मै' को हटा लो तो 'मै एक अलग ' और ' वह एक अलग' , ऐसा विभाग नही रह जायेगा | अहं की यह लाठी है, लाठी उठा लो , वही एक जल बना रहेगा

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

श्री रामकृष्ण परमहंस # 10

############ ॐ ###############

 'मै' मरे , छुटे जन्जाल - अहंकार को चाहे जिस प्रकार से हो नष्ट करो | ज्ञान के माध्यम से हो , चाहे भक्ति के माध्यम से, चाहे कर्म के माध्यम से या चाहे सब को मिलाकर हो |

############ ॐ ###############

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

श्री रामकृष्ण परमहंस # 9

############ ॐ ###############


ध्यान कहां करे | मन मे , वन मे , कोने मे | वन ना जा सके तो घर के कोने मे , एकान्त कोना न मिले तो मन मे- परिवेश के प्रति निरपेक्ष होकर पुकारने से वे मिलते है |
 
############ ॐ ###############

मंगलवार, 3 मार्च 2015

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 8

 ############ ॐ ###############

जब ईश्वर के प्रति परिपुर्ण प्रेम हो जायेगा , तब व्यक्ति के लिये किसी साधना की आवश्यकता ही नही होगी | तब न किसी आचार का प्रयोजन रहेगा, न जप-तप का, न विधि नियम का , न कठोर अनुशासन का | तब तो भक्त केवल आस्वादन लेकर रहेगा. भगवान को लेकर आनन्द मनायेगा|

############ ॐ ###############

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 7

 ############ ॐ ###############

सन्सार मे रहो ,इसमे कोई आपत्ति नही है | यदि भगवान को पकड़ कर संसार मे रहोगे तो संसार का दोष तुम्हारा स्पर्श नही करेगा | जिस बालक का हाथ पिता ने स्वयं पकड रखा हो , या जिसे वह गोद मे उठाकर ले जा रहा हो उसे भय नही है | वह अनायास हाथो से ताली बजाते हुये जा सकता है | और जो बालक स्वयं पिता का हाथ पकड कर चल रहा हो उसके गिर पडने का भय बना रहता है | कभी अन्यमनस्क होकर हाथ से ताली बजाते हुये शायद गिर पडे | उनका अबलंवन करो , उनका भार उन पर छोड दो |

############ ॐ ###############

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 6

############ ॐ ###############
सब उनका है , इस ज्ञान से संसार करो, संसार के भीतर उनको देखने की चेष्टा करो ; उनका संसार है इसे अनुवभ करने की चेष्टा करो |
############ ॐ ###############

शनिवार, 4 दिसंबर 2010

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 5

############ ॐ ###############
भगवान की पुजा जब व्रक्ष मे हो सकती है, पत्थर मे हो सकती है, प्रतिमा मे हो सकती है तब मनुष्य मे क्यो नही हो सकती है|
############ ॐ ###############

सोमवार, 19 जुलाई 2010

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 4

############ ॐ ###############
ईश्वर को हटाकर जो स्वयं का कर्तव्य बोध है, यही विपत्ति का मुल है यदि हम इस बात को सदा स्मरण रख सकते कि सब कुछ वे ही कर रहे है , तब तो और चिन्ता ही नही थी तब तो हम जीवनमुक्त हो जाते लेकिन जो अच्छा है ,उसमे तो हम अपना कर्तव्य देखते है और जो बुरा है उसके लिये यदि कहे कि 'वे करा रहे है' तब तो यह मन के साथ छल करना है
यदि हम पुरी तरह कर्तव्यहीन होते तो शुभ तथा अशुभ किसी भी प्रकार के कर्म के फल के लिये हम उत्त्तरदायी नही होंगे लेकिन जब अपने मे हमे कर्तापन का , भोक्तापन का बोध होता है , तब अच्छे व बुरे दोनो प्रकार के फल भी भोगने पडते है अत: या तो यह सारा दायित्व हम पुरी तरह से अपने ऊपर ले , या फिर सब कुच उनके हाथ मे छोड दे बीच का कोइ रास्ता नही है

यह छल ना करे, यदि हम सम्पूर्ण रुप से उन पर निर्भर ह्प सके तो हमारा विश्वास कभी धोखा नही खायेगा वे ही सब प्रकार के अमंगल से हमारी रक्षा करेंगे
############ ॐ ###############

गुरुवार, 3 जून 2010

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 3

############ ॐ ###############

ईश्वर के संबंध मे हममे से जो जैसी धारणा रखता है, बस वही उसकी सीमा है, ऐसा हम कभी ना सोचे | हम इस बात को हरदम याद रखे कि जो हम अनुवभ कर रहे है, वह उसका रूप है सही , पर इस रूप को छोडकर उसके और कोई रूप नही है यह बात हम कभी न सोचे , हम कभी उसकी इति न करे |

############ ॐ ###############

शुक्रवार, 21 मई 2010

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 2

############ ॐ ###############

तीन आकर्षण एकत्र होने से भगवान मिलते है - माता का पुत्र के प्रति आकर्षण , सती का पति के प्रति आकर्षण , तथा विषयी का विषय के प्रति आकर्षण | इस प्रकार के आकर्षण यदि एकत्र हो कर भगवान की ओर लगे तो भगवान अवश्य मिलते है |

############ ॐ ###############

गुरुवार, 6 मई 2010

श्री राम क्रष्ण परमहंस # 1

############ ॐ ###############

व्यक्ति ने अपना जो कर्तव्य स्वीकार किया है , या जो कर्तव्य उस पर न्यस्त हुआ है| उसका उसे अचुक रुप से निर्लिप्त होकर पालन करना पदेगा | और जो जितनी ही पूर्णता एवं निर्लिप्तता से उसका पालन कर सकेगा ,वह उतना ही शीघ्र इस बन्धन से मुक्त होगा |

############ ॐ ###############